Saturday, March 19, 2011

Arrogance of an Agnostic

एक पत्ता हूँ तूफानों के रुख को बदलते रहता हूँ,
पानी का एक बूँद हूँ सागर के लहरों पे सवार रहता हूँ
एक साँस हूँ जो ज़िंदगी को आबाद करती है,
समय का एक पल हूँ जहाँ सदियाँ बदल जाती हैं,
अनंत पे एक बिंदु हूँ जहाँ तुम्हारी नज़रें बरबस ठहर जाती हैं,

दिगंत का लकीर हूँ जहाँ समय और शून्य सिमट जाते हैं,
और अंत मे,
वो एक कोशिका हूँ जिसमें अनगिनत पीढियां समायीं हैं।